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भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी माँ सीता ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया।परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते! माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की.. परन्तु जब पत्नी उर्मिला के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा!! क्या कहूंगा!! यदि बिना बताए जाऊंगा तो रो रोके जान दे देगी और यदि बताया तो साथ जाने की ज़िद्द करने लगेगी और कहेगी कि यदि सीता जी अपने पति के साथ जा सकती हैं तो मैं क्यों नहीं!!यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं- "आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु की सेवा में वन को जाओ। मैं आपको नहीं रोकुंगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।"लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था। परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया।वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है। पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे!पत्नी का इतना त्याग और प्रेम देखकर लक्ष्मण जी भी रो पड़े। उर्मिला जी ने एक दीपक जलाया और विनती की कि मेरी इस आस को कभी बुझने नहीं देना। लक्ष्मण जी तो चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला जी ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया। वन में भैया-भाभी की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया। मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण को शक्ति लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पहाड़ लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में अयोध्या में भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं। तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि सीता जी को रावण ले गया, लक्ष्मण जी मूर्छित हैं। यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि लक्ष्मण के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे।माता सुमित्रा कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं। अभी शत्रुघ्न है। मैं उसे भेज दूंगी। मेरे दोनों पुत्र राम सेवा के लिये ही तो जन्मे हैं।माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो सोचने लगे कि यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं? क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं?हनुमान जी पूछते हैं- देवी! आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं। सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा। उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणि उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा।वे बोलीं- "मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता। रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता।आपने कहा कि प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं। जो योगेश्वर राम की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता। यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं। मेरे पति जब से वन गये हैं, तबसे सोये नहीं हैं। उन्होंने न सोने का प्रण लिया था। इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं। और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया। वे उठ जायेंगे।और शक्ति मेरे पति को लगी ही नहीं शक्ति तो राम जी को लगी है। मेरे पति की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में हैं ही सिर्फ राम, तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा। इसलिये हनुमान जी आप निश्चिन्त होके जाएँ। सूर्य उदित नहीं होगा।"वास्तव में सूर्य में भी इतनी ताकत नहीं थी कि लक्ष्मण जी के जागने से पहले वो उदित हो जाते! एक पतिव्रता तपस्विनी का तप उनके सामने खड़ा था। और मेघनाथ को भी लक्ष्मण जी ने नहीं, अयोध्या में बैठी एक तपस्विनी उर्मिला ने मारा।राम राज्य की नींव जनक की बेटियां ही थीं... कभी सीता तो कभी उर्मिला। भगवान् राम ने तो केवल राम राज्य का कलश स्थापित किया परन्तु वास्तव में राम राज्य इन सबके प्रेम, त्याग, समपर्ण, बलिदान से ही आया,,*।।जय जय श्री राम।।**।।हर हर महादेव।।*भगवान श्री राम का सेवक वनिता कासनियां द्वारा

भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी माँ सीता ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया। परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते! माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की.. परन्तु जब पत्नी उर्मिला के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा!! क्या कहूंगा!! यदि बिना बताए जाऊंगा तो रो रोके जान दे देगी और यदि बताया तो साथ जाने की ज़िद्द करने लगेगी और कहेगी कि यदि सीता जी अपने पति के साथ जा सकती हैं तो मैं क्यों नहीं!! यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं- "आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु की सेवा में वन को जाओ। मैं आपको नहीं रोकुंगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।" लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था। परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया। वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है। पति संकोच में पड़े, उससे पहले...

♻ *कन्या पूजन से सभी तरह के वास्तु दोष,विघ्न, भय और शत्रुओं का नाश होता है।*⚱ *नवरात्रि में कन्या पूजन में ध्यान रखे कि कन्याओ की उम्र दो वर्ष से कम और दस वर्ष से ज्यादा भी न हो ।*⚱ *शास्त्रों के अनुसार दो वर्ष की कन्या kanya को कुमारी कहा गया है । कुमारी के पूजन से सभी तरह के दुखों और दरिद्रता का नाश होता है ।*⚱ *तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति माना गया है । त्रिमूर्ति के पूजन poojan से धन लाभ होता है ।*⚱ *चार वर्ष की कन्या को कल्याणी कहते है । कल्याणी के पूजन poojan से जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है ।* ⚱ *पांच वर्ष की कन्या kanya को रोहिणी कहा गया है । माँ के रोहणी स्वरूप की पूजा करने से जातक के घर परिवार से सभी रोग दूर होते है।*⚱ *छः वर्ष की कन्या kanya को काली कहते है । माँ के इस स्वरूप की पूजा करने से ज्ञान, बुद्धि, यश और सभी क्षेत्रों में विजय की प्राप्ति होती है ।*⚱ *सात वर्ष की कन्या को चंडिका कहते है । माँ चण्डिका के इस स्वरूप की पूजा करने से धन, सुख और सभी तरह की ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है ।*⚱ *आठ वर्ष की कन्या को शाम्भवी कहते है । शाम्भवी की पूजा करने से युद्ध, न्यायलय में विजय और यश की प्राप्ति होती है ।*⚱ *नौ वर्ष की कन्या को दुर्गा का स्वरूप मानते है । माँ के इस स्वरूप की अर्चना करने से समस्त विघ्न बाधाएं दूर होती है, शत्रुओं का नाश होता है और कठिन से कठिन कार्यों में भी सफलता प्राप्त होती है ।*⚱ *दस वर्ष की कन्या को सुभद्रा स्वरूपा माना गया हैं। माँ के इस स्वरूप की आराधना करने से सभी मनवाँछित फलों की प्राप्ति होती है और सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते है ।*⚱ *इसीलिए नवरात्र के इन नौ दिनों तक प्रतिदिन इन देवी स्वरुप कन्याओं को अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य से भेंट देना अति शुभ माना जाता है। इन दिनों इन नन्ही देवियों को फूल, श्रंगार सामग्री, मीठे फल (जैसे केले, सेब,नारियल आदि), मिठाई, खीर , हलवा, कपड़े, रुमाल,रिबन, खिलौने, मेहंदी आदि उपहार में देकर मां दुर्गा की अवश्य ही कृपा प्राप्त की जा सकती है ।*By वनिता कासनियां पंजाब⚱ *इन उपरोक्त रीतियों के अनुसार माता की पूजा अर्चना करने से देवी मां प्रसन्न होकर हमें सुख, सौभाग्य,यश, कीर्ति, धन और अतुल वैभव का वरदान देती है।*भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी माँ सीता ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया।परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते! माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की.. परन्तु जब पत्नी उर्मिला के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा!! क्या कहूंगा!! यदि बिना बताए जाऊंगा तो रो रोके जान दे देगी और यदि बताया तो साथ जाने की ज़िद्द करने लगेगी और कहेगी कि यदि सीता जी अपने पति के साथ जा सकती हैं तो मैं क्यों नहीं!!यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं- "आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु की सेवा में वन को जाओ। मैं आपको नहीं रोकुंगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।"लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था। परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया।वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है। पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे!पत्नी का इतना त्याग और प्रेम देखकर लक्ष्मण जी भी रो पड़े। उर्मिला जी ने एक दीपक जलाया और विनती की कि मेरी इस आस को कभी बुझने नहीं देना। लक्ष्मण जी तो चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला जी ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया। वन में भैया-भाभी की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया। मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण को शक्ति लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पहाड़ लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में अयोध्या में भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं। तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि सीता जी को रावण ले गया, लक्ष्मण जी मूर्छित हैं। यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि लक्ष्मण के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे।माता सुमित्रा कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं। अभी शत्रुघ्न है। मैं उसे भेज दूंगी। मेरे दोनों पुत्र राम सेवा के लिये ही तो जन्मे हैं।माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो सोचने लगे कि यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं? क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं?हनुमान जी पूछते हैं- देवी! आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं। सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा। उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणि उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा।वे बोलीं- "मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता। रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता।आपने कहा कि प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं। जो योगेश्वर राम की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता। यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं। मेरे पति जब से वन गये हैं, तबसे सोये नहीं हैं। उन्होंने न सोने का प्रण लिया था। इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं। और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया। वे उठ जायेंगे।और शक्ति मेरे पति को लगी ही नहीं शक्ति तो राम जी को लगी है। मेरे पति की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में हैं ही सिर्फ राम, तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा। इसलिये हनुमान जी आप निश्चिन्त होके जाएँ। सूर्य उदित नहीं होगा।"वास्तव में सूर्य में भी इतनी ताकत नहीं थी कि लक्ष्मण जी के जागने से पहले वो उदित हो जाते! एक पतिव्रता तपस्विनी का तप उनके सामने खड़ा था। और मेघनाथ को भी लक्ष्मण जी ने नहीं, अयोध्या में बैठी एक तपस्विनी उर्मिला ने मारा।राम राज्य की नींव जनक की बेटियां ही थीं... कभी सीता तो कभी उर्मिला। भगवान् राम ने तो केवल राम राज्य का कलश स्थापित किया परन्तु वास्तव में राम राज्य इन सबके प्रेम, त्याग, समपर्ण, बलिदान से ही आया,,*।।जय जय श्री राम।।**।।हर हर महादेव।।*भगवान श्री राम का सेवक वनिता कासनियां पंजाब

♻ *कन्या पूजन से सभी तरह के वास्तु दोष,विघ्न, भय और शत्रुओं का नाश होता है।* ⚱ *नवरात्रि में कन्या पूजन में ध्यान रखे कि कन्याओ की उम्र दो वर्ष से कम और दस वर्ष से ज्यादा भी न हो ।* ⚱ *शास्त्रों के अनुसार दो वर्ष की कन्या kanya को कुमारी कहा गया है । कुमारी के पूजन से सभी तरह के दुखों और दरिद्रता का नाश होता है ।* ⚱ *तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति माना गया है । त्रिमूर्ति के पूजन poojan से धन लाभ होता है ।* ⚱ *चार वर्ष की कन्या को कल्याणी कहते है । कल्याणी के पूजन poojan से जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है ।*   ⚱ *पांच वर्ष की कन्या kanya को रोहिणी कहा गया है । माँ के रोहणी स्वरूप की पूजा करने से जातक के घर परिवार से सभी रोग दूर होते है।* ⚱ *छः वर्ष की कन्या kanya को काली कहते है । माँ के इस स्वरूप की पूजा करने से ज्ञान, बुद्धि, यश और सभी क्षेत्रों में विजय की प्राप्ति होती है ।* ⚱ *सात वर्ष की कन्या को चंडिका कहते है । माँ चण्डिका के इस स्वरूप की पूजा करने से धन, सुख और सभी तरह की ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है ।* ⚱ *आठ वर्ष की कन्या को शाम्भवी कह...

*विधि का विधान*भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक।और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया-*सुनहु भरत भावी प्रबल**बिलखि कहेहूं मुनिनाथ**हानि लाभ जीवन-मरण**यश-अपयश विधि हाथ*अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा।*ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है।*ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।*#रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके।ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं।#वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा*मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।**इसलिए सरल रहें, सहज रहें, मन कर्म और वचन से सद्कर्म में लीन रहें।*

*विधि का विधान* भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक। और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया- *सुनहु भरत भावी प्रबल* *बिलखि कहेहूं मुनिनाथ* *हानि लाभ जीवन-मरण* *यश-अपयश विधि हाथ* अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा। *ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। *ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।* #रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके। ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं। #वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा *मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।* ...

🪴जय श्री राम🪴 श्री कृष्ण द्वारा की गई राम नाम की महिमा का वर्णन कौन-कौन से ग्रंथ में किया गया है?श्रीकृष्ण द्वारा राम नाम की महिमा अनेक ग्रंथों में वर्णित है जैसे पद्मपुराण, आदिपुराण, श्रीमद् भुसुंडीरामायण, श्रीमद वाल्मीकियानंद रामायण इत्यादि। पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राम नाम की महिमा का वर्णन अर्जुन के प्रति निम्न प्रकार है:~ अथ श्रीपद्मपुराण वर्णित रामनामामृत स्त्रोत श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद~ अर्जुन उवाच~ १) भुक्तिमुक्तिप्रदातृणां सर्वकामफलप्रदं । सर्वसिद्धिकरानन्त नमस्तुभ्यं जनार्दन ॥ अर्थ:~ सभी भोग और मुक्ति के फल दाता, सभी कर्मों का फल देने वाले, सभी कार्य को सिद्ध करने वाले जनार्दन मैं आपको नमन करता हूं। २) यं कृत्वा श्री जगन्नाथ मानवा यान्ति सद्गतिम् । ममोपरि कृपां कृत्वा तत्त्वं ब्रहिमुखालयम्।। अर्थ:~हे श्रीजगन्नाथ! मनुष्य ऐसा क्या करें कि उसे अंत में सद्गति हो? वह तत्व क्या है? मेरे पर कृपा करके अपने ब्रह्ममुख से बताइए। श्रीकृष्ण उवाच~ १) यदि पृच्छसि कौन्तेय सत्यं सत्यं वदाम्यहम् । लोकानान्तु हितातार्थाय इह लोके परत्र च ॥ अर्थ:~ हे कुंती पुत्र! यदि तुम मुझसे पूछते हो तो मैं सत्य सत्य बताता हूं, इस लोक और परलोक में हित करने वाला क्या है। २) रामनाम सदा पुण्यं नित्यं पठति यो नरः । अपुत्रो लभते पुत्रं सर्वकामफलप्रदम् ॥ अर्थ:~श्रीराम का नाम सदा पुण्य करने वाला नाम है, जो मनुष्य इसका नित्य पाठ करता है उसे पुत्र लाभ मिलता है और सभी कामनाएं पूर्ण होती है। ३) मङ्गलानि गृहे तस्य सर्वसौख्यानि भारत। अहोरात्रं च येनोक्तं राम इत्यक्षरद्वयम्।। अर्थ:~हे भारत! उसके घर में सभी प्रकार के सुख और मंगल विराजित हो जाते हैं, जिसने दिन-रात श्रीराम नाम के दो अक्षरों का उच्चारण कर लिया। ४) गङ्गा सरस्वती रेवा यमुना सिन्धु पुष्करे। केदारेतूदकं पीतं राम इत्यक्षरद्वयम् ॥ अर्थ~जिसने श्रीरामनाम के इन दो अक्षरों का उच्चारण कर लिया उसने श्रीगंगा, सरस्वती, रेवा, यमुना, सिंधु, पुष्कर, केदारनाथ आदि सभी तीर्थों का स्नान, जलपान कर लिया। ५) अतिथेः पोषणं चैव सर्व तीर्थावगाहनम् । सर्वपुण्यं समाप्नोति रामनाम प्रसादतः ।। अर्थ:~उसने अतिथियों का पोषण कर लिया, सभी तीर्थों में स्नान आदि कर लिया, उसने सभी पुण्य कर्म कर लिए जिसने श्रीराम नाम का उच्चारण कर लिया। ६) सूर्यपर्व कुरुक्षेत्रे कार्तिक्यां स्वामि दर्शने। कृपापात्रेण वै लब्धं येनोक्तमक्षरद्वयम्।। अर्थ:~उसने सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्नान कर लिया और कार्तिक पूर्णिमा में कार्तिक जी का दर्शन करके कृपा प्राप्त कर ली जिसने श्रीराम नाम का उच्चारण कर लिया। ७) न गंङ्गा न गया काशी नर्मदा चैव पुष्करम् । सदृशं रामनाम्नस्तु न भवन्ति कदाचन।। अर्थ:~ ना तो गंगा, गया, काशी, प्रयाग, पुष्कर, नर्मदादिक इन सब में कोई भी श्रीराम नाम की महिमा के समक्ष नहीं हो सकते। ८) येन दत्तं हुतं तप्तं सदा विष्णुः समर्चितः। जिह्वाग्रे वर्तते यस्य राम इत्यक्षरद्वयम्।। अर्थ:~उसने भांति-भांति के हवन, दान, तप और विष्णु भगवान की आराधना कर ली, जिसकी जिह्वा के अग्रभाग पर श्रीराम नाम के दो अक्षर विराजित हो गए। ९) माघस्नानं कृतं येन गयायां पिण्डपातनम् । सर्वकृत्यं कृतं तेन येनोक्तं रामनामकम्।। अर्थ:~ उसने प्रयागजी में माघ का स्नान कर लिया, गयाजी में पिंडदान कर लिया उसने अपने सभी कार्यों को पूर्ण कर लिया जिसने श्रीराम नाम का उच्चारण कर लिया। १०) प्रायश्चित्तं कृतं तेन महापातकनाशनम् । तपस्तप्तं च येनोक्तं राम इत्यक्षरद्वयम् ।। अर्थ~उसने अपने सभी महापापों का नाश करके प्रायश्चित कर लिया और तपस्या पूर्ण कर ली जिसने श्रीराम नाम के दो अक्षर का उच्चारण कर लिया। ११) चत्वारः पठिता वेदास्सर्वे यज्ञाश्च याजिताः । त्रिलोकी मोचिता तेन राम इत्यक्षरद्वयम् ।। अर्थ~उसने चारों वेदों का सांगोपांग पाठ कर लिया सभी यज्ञ आदि कर्म कर लिए उसने तीनों लोगों को तार दिया जिसने श्रीराम नाम के दो अक्षर का पाठ कर लिया। १२) भूतले सर्व तीर्थानि आसमुद्रसरांसि च। सेवितानि च येनोक्तं राम इत्यक्षरद्वयम् ।। अर्थ~उसने भूतल पर सभी तीर्थ, समुद्र, सरोवर आदि का सेवन कर लिया जिसने श्रीराम नाम के दो अक्षरों का जाप कर लिया। अर्जुन उवाच~ १) यदा म्लेच्छमयी पृथ्वी भविष्यति कलौयुगे । किं करिष्यति लोकोऽयं पतितो रौरवालये ।। अर्थ~भविष्य में कलयुग आने पर पूरी पृथ्वी मलेच्छ मयी हो जाएगी इसका स्वरूप रौ-रौ नर्क की भांति हो जाएगा तब जीव कौन सा साधन करके परम पद पाएगा? श्रीकृष्ण उवाच~ १) न सन्देहस्त्वया काय्र्यो न वक्तव्यं पुनः पुनः । पापी भवति धर्मात्मा रामनाम प्रभावतः ।। अर्थ~यह संदेह करने योग्य नहीं है, जैसे संदेह व्यर्थ है वैसे बार-बार वक्तव्य देना भी व्यर्थ है। कैसा भी पापी हो श्रीराम नाम के प्रभाव से वह धर्मात्मा हो जाता है २) न म्लेच्छस्पर्शनात्तस्य पापं भवति देहिनः । तस्मात्प्रमुच्यते जन्तुर्यस्मरेद्रामद्वचत्तरम् ।। अर्थ~उसे मलेच्छ के स्पर्श का भी पाप नहीं होता, मलेच्छ संबंधित पाप भी छूट जाते हैं जो श्रीराम नाम के दो अक्षरों का जाप करते हैं। ३) रामस्तत्वमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः। कुलायुतं समुद्धृत्य रामलोके महीयते ।। अर्थ~जो श्रीराम से संबंध रखने वाले स्त्रोत का पाठ करते हैं तथा जिनकी भक्ति, विश्वास और श्रद्धा श्रीराम में सुदृढ़ है। वह लोग अपने दस हज़ार पीढ़ियों का उद्धार करके श्रीराम के लोक में पूजित होते है। ४) रामनामामृतं स्तोत्रं सायं प्रातः पठेन्नरः । गोघ्नः स्त्रीबालघाती च सर्व पापैः प्रमुच्यते ।। अर्थ~जो सुबह शाम इस रामनामामृत स्त्रोत का पाठ करते हैं वे गौ हत्या, स्त्री और बच्चों को हानि पहुंचाने वाले पाप से भी बच कर मुक्त हो जाते हैं। (इति श्रीपद्मपुराणे रामनामामृत स्त्रोते श्रीकृष्ण अर्जुन संवादे संपूर्णम्) श्रीमद् वाल्मीकियानंद रामायण से कुछ श्लोक उद्धत कर रहा हूं जहां भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से श्री राम नाम की महिमा कही है:~ 1) जो मंत्र भगवान श्री राम ने हनुमान जी को दिया था उसी मंत्र का वर्णन करते हुए श्री कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं:~ श्री कृष्ण उवाच युधिष्ठिर के प्रति~ रामनाम्नः परं नास्ति मोक्ष लक्ष्मी प्रदायकम्। तेजोरुपं यद् अवयक्तं रामनाम अभिधियते।। (श्रीमद् वाल्मीकियानंद रामायण~८/७/१६) श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं किस शास्त्र में ऐसा कोई भी मंत्र वर्णित नहीं है जो श्रीराम के नाम के बराबर हो जो ऐश्वर्य (धन) और मुक्ति दोनों देने में सक्षम हो। श्रीराम का नाम स्वयं ज्योतिर्मय नाम कहा गया है, जिसको मैं भी व्यक्त नहीं कर सकता। 2) मंत्रा नानाविधाः सन्ति शतशो राघवस्य च। तेभ्यस्त्वेकं वदाम्यद्य तव मंत्रं युधिष्ठिर।। श्रीशब्धमाद्य जयशब्दमध्यंजयद्वेयेनापि पुनःप्रयुक्तम्। अनेनैव च मन्त्रेण जपः कार्यः सुमेधसा। ( श्रीमद् वाल्मीकियानंद रामायण, 9~7.44,45a,46a) वैसे तो श्रीराघाव के अनेक मन्त्र हैं, किन्तु युधिष्ठिर उनमें से एक उत्तम मन्त्र मैं तुमको बतलाता हूँ । पूर्वमें श्रीराम शब्द, मध्यमें जय शब्द और अन्तमें दो जय शब्दोंसे मिला हुआ (श्रीराम जय राम जय जय राम) राममन्त्र। बुद्धिमान जनों को सिर्फ इसी मंत्र का जाप करना चाहिए। ~आदि पुराण में तो बहुत सारा वर्णन दे रखा है लेकिन वहां से केवल एक श्लोक ही उदित कर रहा हूं। राम नाम सदा प्रेम्णा संस्मरामि जगद्गुरूम्। क्षणं न विस्मृतिं याति सत्यं सत्यं वचो मम ॥ (श्री आदि-पुराण ~ श्री कृष्ण वाक्य अर्जुन के प्रति) मैं ! जगद्गुरु श्रीराम के नाम का निरंतर प्रेम पूर्वक स्मरण करता रहता हूँ, क्षणमात्र भी नहीं भूलता हूँ । अर्जुन मैं सत्य सत्य कहता हूँ । ~एक श्लोक शुक संहिता से भी उदित कर रहा हूं। रामस्याति प्रिय नाम रामेत्येव सनातनम्। दिवारात्रौ गृणन्नेषो भाति वृन्दावने स्थितः ।। वनिता कासनियां पंजाब द्वारा (श्री शुक संहिता) श्री राम नाम भगवान राम को सबसे प्रिय नाम है और यह नाम भगवान राघव का शाश्वत नाम है। श्रीराम के इस शाश्वत नाम का जप करने से भगवान कृष्ण वृंदावन में सुशोभित होते हैं। ऐसे अनेकों अनेक श्लोक और लिख सकता हूं लेकिन विस्तार भय के कारण आगे नहीं लिख रहा हूं। और अंत में एक मनुस्मृति के श्लोक से अपनी वाणी को विराम देती हूं:~ सप्तकोट्यो महामन्त्राश्चित्तविभ्रमकारकाः । एक एव परो मन्त्रो 'राम' इत्यक्षरद्वयम् ॥ (मनुस्मृति) सात करोड़ महामंत्र हैं, वे सब के सब आपके चित्तको भ्रमित करनेवाले हैं। यह दो अक्षरोंवाला 'राम' नाम परम मन्त्र है। यह सब मन्त्रोंमें श्रेष्ठ मंत्र है । सब मंत्र इसके अन्तर्गत आ जाते हैं। कोई भी मन्त्र बाहर नहीं रहता। सब शक्तियाँ इसके अन्तर्गत हैं। (यह श्लोक सारस्त्व तंत्र में भी पाया जाता है) अवध के राजदुलारे श्रीरघुनंदन की जय❤️❤️

🪴जय श्री राम🪴श्री कृष्ण द्वारा की गई राम नाम की महिमा का वर्णन कौन-कौन से ग्रंथ में किया गया है?श्रीकृष्ण द्वारा राम नाम की महिमा अनेक ग्रंथों में वर्णित है जैसे पद्मपुराण, आदिपुराण, श्रीमद् भुसुंडीरामायण, श्रीमद वाल्मीकियानंद रामायण इत्यादि।पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राम नाम की महिमा का वर्णन अर्जुन के प्रति निम्न प्रकार है:~अथ श्रीपद्मपुराण वर्णित रामनामामृत स्त्रोत श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद~अर्जुन उवाच~१)भुक्तिमुक्तिप्रदातृणां सर्वकामफलप्रदं ।सर्वसिद्धिकरानन्त नमस्तुभ्यं जनार्दन ॥अर्थ:~ सभी भोग और मुक्ति के फल दाता, सभी कर्मों का फल देने वाले, सभी कार्य को सिद्ध करने वाले जनार्दन मैं आपको नमन करता हूं।२)यं कृत्वा श्री जगन्नाथ मानवा यान्ति सद्गतिम् ।ममोपरि कृपां कृत्वा तत्त्वं ब्रहिमुखालयम्।।अर्थ:~हे श्रीजगन्नाथ! मनुष्य ऐसा क्या करें कि उसे अंत में सद्गति हो? वह तत्व क्या है? मेरे पर कृपा करके अपने ब्रह्ममुख से बताइए।श्रीकृष्ण उवाच~१)यदि पृच्छसि कौन्तेय सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।लोकानान्तु हितातार्थाय इह लोके परत्र च ॥अर्थ:~ हे कुंती पुत्र! यदि तुम मुझसे पूछते हो तो मैं सत्य सत्य बताता हूं, इस लोक और परलोक में हित करने वाला क्या है।२)रामनाम सदा पुण्यं नित्यं पठति यो नरः ।अपुत्रो लभते पुत्रं सर्वकामफलप्रदम् ॥अर्थ:~श्रीराम का नाम सदा पुण्य करने वाला नाम है, जो मनुष्य इसका नित्य पाठ करता है उसे पुत्र लाभ मिलता है और सभी कामनाएं पूर्ण होती है।३)मङ्गलानि गृहे तस्य सर्वसौख्यानि भारत।अहोरात्रं च येनोक्तं राम इत्यक्षरद्वयम्।।अर्थ:~हे भारत! उसके घर में सभी प्रकार के सुख और मंगल विराजित हो जाते हैं, जिसने दिन-रात श्रीराम नाम के दो अक्षरों का उच्चारण कर लिया।४)गङ्गा सरस्वती रेवा यमुना सिन्धु पुष्करे।केदारेतूदकं पीतं राम इत्यक्षरद्वयम् ॥अर्थ~जिसने श्रीरामनाम के इन दो अक्षरों का उच्चारण कर लिया उसने श्रीगंगा, सरस्वती, रेवा, यमुना, सिंधु, पुष्कर, केदारनाथ आदि सभी तीर्थों का स्नान, जलपान कर लिया।५)अतिथेः पोषणं चैव सर्व तीर्थावगाहनम् ।सर्वपुण्यं समाप्नोति रामनाम प्रसादतः ।।अर्थ:~उसने अतिथियों का पोषण कर लिया, सभी तीर्थों में स्नान आदि कर लिया, उसने सभी पुण्य कर्म कर लिए जिसने श्रीराम नाम का उच्चारण कर लिया।६)सूर्यपर्व कुरुक्षेत्रे कार्तिक्यां स्वामि दर्शने।कृपापात्रेण वै लब्धं येनोक्तमक्षरद्वयम्।।अर्थ:~उसने सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्नान कर लिया और कार्तिक पूर्णिमा में कार्तिक जी का दर्शन करके कृपा प्राप्त कर ली जिसने श्रीराम नाम का उच्चारण कर लिया।७)न गंङ्गा न गया काशी नर्मदा चैव पुष्करम् ।सदृशं रामनाम्नस्तु न भवन्ति कदाचन।।अर्थ:~ ना तो गंगा, गया, काशी, प्रयाग, पुष्कर, नर्मदादिक इन सब में कोई भी श्रीराम नाम की महिमा के समक्ष नहीं हो सकते।८)येन दत्तं हुतं तप्तं सदा विष्णुः समर्चितः।जिह्वाग्रे वर्तते यस्य राम इत्यक्षरद्वयम्।।अर्थ:~उसने भांति-भांति के हवन, दान, तप और विष्णु भगवान की आराधना कर ली, जिसकी जिह्वा के अग्रभाग पर श्रीराम नाम के दो अक्षर विराजित हो गए।९)माघस्नानं कृतं येन गयायां पिण्डपातनम् ।सर्वकृत्यं कृतं तेन येनोक्तं रामनामकम्।।अर्थ:~ उसने प्रयागजी में माघ का स्नान कर लिया, गयाजी में पिंडदान कर लिया उसने अपने सभी कार्यों को पूर्ण कर लिया जिसने श्रीराम नाम का उच्चारण कर लिया।१०)प्रायश्चित्तं कृतं तेन महापातकनाशनम् ।तपस्तप्तं च येनोक्तं राम इत्यक्षरद्वयम् ।।अर्थ~उसने अपने सभी महापापों का नाश करके प्रायश्चित कर लिया और तपस्या पूर्ण कर ली जिसने श्रीराम नाम के दो अक्षर का उच्चारण कर लिया।११)चत्वारः पठिता वेदास्सर्वे यज्ञाश्च याजिताः ।त्रिलोकी मोचिता तेन राम इत्यक्षरद्वयम् ।।अर्थ~उसने चारों वेदों का सांगोपांग पाठ कर लिया सभी यज्ञ आदि कर्म कर लिए उसने तीनों लोगों को तार दिया जिसने श्रीराम नाम के दो अक्षर का पाठ कर लिया।१२)भूतले सर्व तीर्थानि आसमुद्रसरांसि च।सेवितानि च येनोक्तं राम इत्यक्षरद्वयम् ।।अर्थ~उसने भूतल पर सभी तीर्थ, समुद्र, सरोवर आदि का सेवन कर लिया जिसने श्रीराम नाम के दो अक्षरों का जाप कर लिया।अर्जुन उवाच~१)यदा म्लेच्छमयी पृथ्वी भविष्यति कलौयुगे ।किं करिष्यति लोकोऽयं पतितो रौरवालये ।।अर्थ~भविष्य में कलयुग आने पर पूरी पृथ्वी मलेच्छ मयी हो जाएगी इसका स्वरूप रौ-रौ नर्क की भांति हो जाएगा तब जीव कौन सा साधन करके परम पद पाएगा?श्रीकृष्ण उवाच~१)न सन्देहस्त्वया काय्र्यो न वक्तव्यं पुनः पुनः ।पापी भवति धर्मात्मा रामनाम प्रभावतः ।।अर्थ~यह संदेह करने योग्य नहीं है, जैसे संदेह व्यर्थ है वैसे बार-बार वक्तव्य देना भी व्यर्थ है। कैसा भी पापी हो श्रीराम नाम के प्रभाव से वह धर्मात्मा हो जाता है२)न म्लेच्छस्पर्शनात्तस्य पापं भवति देहिनः ।तस्मात्प्रमुच्यते जन्तुर्यस्मरेद्रामद्वचत्तरम् ।।अर्थ~उसे मलेच्छ के स्पर्श का भी पाप नहीं होता, मलेच्छ संबंधित पाप भी छूट जाते हैं जो श्रीराम नाम के दो अक्षरों का जाप करते हैं।३)रामस्तत्वमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः।कुलायुतं समुद्धृत्य रामलोके महीयते ।।अर्थ~जो श्रीराम से संबंध रखने वाले स्त्रोत का पाठ करते हैं तथा जिनकी भक्ति, विश्वास और श्रद्धा श्रीराम में सुदृढ़ है। वह लोग अपने दस हज़ार पीढ़ियों का उद्धार करके श्रीराम के लोक में पूजित होते है।४)रामनामामृतं स्तोत्रं सायं प्रातः पठेन्नरः ।गोघ्नः स्त्रीबालघाती च सर्व पापैः प्रमुच्यते ।।अर्थ~जो सुबह शाम इस रामनामामृत स्त्रोत का पाठ करते हैं वे गौ हत्या, स्त्री और बच्चों को हानि पहुंचाने वाले पाप से भी बच कर मुक्त हो जाते हैं।(इति श्रीपद्मपुराणे रामनामामृत स्त्रोते श्रीकृष्ण अर्जुन संवादे संपूर्णम्)श्रीमद् वाल्मीकियानंद रामायण से कुछ श्लोक उद्धत कर रहा हूं जहां भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से श्री राम नाम की महिमा कही है:~1) जो मंत्र भगवान श्री राम ने हनुमान जी को दिया था उसी मंत्र का वर्णन करते हुए श्री कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं:~श्री कृष्ण उवाच युधिष्ठिर के प्रति~रामनाम्नः परं नास्ति मोक्ष लक्ष्मी प्रदायकम्।तेजोरुपं यद् अवयक्तं रामनाम अभिधियते।।(श्रीमद् वाल्मीकियानंद रामायण~८/७/१६)श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं किस शास्त्र में ऐसा कोई भी मंत्र वर्णित नहीं है जो श्रीराम के नाम के बराबर हो जो ऐश्वर्य (धन) और मुक्ति दोनों देने में सक्षम हो। श्रीराम का नाम स्वयं ज्योतिर्मय नाम कहा गया है, जिसको मैं भी व्यक्त नहीं कर सकता।2)मंत्रा नानाविधाः सन्ति शतशो राघवस्य च।तेभ्यस्त्वेकं वदाम्यद्य तव मंत्रं युधिष्ठिर।।श्रीशब्धमाद्य जयशब्दमध्यंजयद्वेयेनापि पुनःप्रयुक्तम्।अनेनैव च मन्त्रेण जपः कार्यः सुमेधसा।( श्रीमद् वाल्मीकियानंद रामायण, 9~7.44,45a,46a)वैसे तो श्रीराघाव के अनेक मन्त्र हैं, किन्तु युधिष्ठिर उनमें से एक उत्तम मन्त्र मैं तुमको बतलाता हूँ । पूर्वमें श्रीराम शब्द, मध्यमें जय शब्द और अन्तमें दो जय शब्दोंसे मिला हुआ (श्रीराम जय राम जय जय राम) राममन्त्र। बुद्धिमान जनों को सिर्फ इसी मंत्र का जाप करना चाहिए।~आदि पुराण में तो बहुत सारा वर्णन दे रखा है लेकिन वहां से केवल एक श्लोक ही उदित कर रहा हूं।राम नाम सदा प्रेम्णा संस्मरामि जगद्गुरूम्।क्षणं न विस्मृतिं याति सत्यं सत्यं वचो मम ॥(श्री आदि-पुराण ~ श्री कृष्ण वाक्य अर्जुन के प्रति)मैं ! जगद्गुरु श्रीराम के नाम का निरंतर प्रेम पूर्वक स्मरण करता रहता हूँ, क्षणमात्र भी नहीं भूलता हूँ । अर्जुन मैं सत्य सत्य कहता हूँ ।~एक श्लोक शुक संहिता से भी उदित कर रहा हूं।रामस्याति प्रिय नाम रामेत्येव सनातनम्।दिवारात्रौ गृणन्नेषो भाति वृन्दावने स्थितः ।।वनिता कासनियां पंजाब द्वारा(श्री शुक संहिता)श्री राम नाम भगवान राम को सबसे प्रिय नाम है और यह नाम भगवान राघव का शाश्वत नाम है। श्रीराम के इस शाश्वत नाम का जप करने से भगवान कृष्ण वृंदावन में सुशोभित होते हैं।ऐसे अनेकों अनेक श्लोक और लिख सकता हूं लेकिन विस्तार भय के कारण आगे नहीं लिख रहा हूं।और अंत में एक मनुस्मृति के श्लोक से अपनी वाणी को विराम देती हूं:~सप्तकोट्यो महामन्त्राश्चित्तविभ्रमकारकाः ।एक एव परो मन्त्रो 'राम' इत्यक्षरद्वयम् ॥(मनुस्मृति)सात करोड़ महामंत्र हैं, वे सब के सब आपके चित्तको भ्रमित करनेवाले हैं। यह दो अक्षरोंवाला 'राम' नाम परम मन्त्र है। यह सब मन्त्रोंमें श्रेष्ठ मंत्र है । सब मंत्र इसके अन्तर्गत आ जाते हैं। कोई भी मन्त्र बाहर नहीं रहता। सब शक्तियाँ इसके अन्तर्गत हैं।(यह श्लोक सारस्त्व तंत्र में भी पाया जाता है)अवध के राजदुलारे श्रीरघुनंदन की जय❤️❤️

🪴जय श्री राम🪴 श्री कृष्ण द्वारा की गई राम नाम की महिमा का वर्णन कौन-कौन से ग्रंथ में किया गया है? श्रीकृष्ण द्वारा राम नाम की महिमा अनेक ग्रंथों में वर्णित है जैसे पद्मपुराण, आदिपुराण, श्रीमद् भुसुंडीरामायण, श्रीमद वाल्मीकियानंद रामायण इत्यादि। पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राम नाम की महिमा का वर्णन अर्जुन के प्रति निम्न प्रकार है:~ अथ श्रीपद्मपुराण वर्णित रामनामामृत स्त्रोत श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद~ अर्जुन उवाच~ १) भुक्तिमुक्तिप्रदातृणां सर्वकामफलप्रदं । सर्वसिद्धिकरानन्त नमस्तुभ्यं जनार्दन ॥ अर्थ:~ सभी भोग और मुक्ति के फल दाता, सभी कर्मों का फल देने वाले, सभी कार्य को सिद्ध करने वाले जनार्दन मैं आपको नमन करता हूं। २) यं कृत्वा श्री जगन्नाथ मानवा यान्ति सद्गतिम् । ममोपरि कृपां कृत्वा तत्त्वं ब्रहिमुखालयम्।। अर्थ:~हे श्रीजगन्नाथ! मनुष्य ऐसा क्या करें कि उसे अंत में सद्गति हो? वह तत्व क्या है? मेरे पर कृपा करके अपने ब्रह्ममुख से बताइए। श्रीकृष्ण उवाच~ १) यदि पृच्छसि कौन्तेय सत्यं सत्यं वदाम्यहम् । लोकानान्तु हितातार्थाय इह लोके परत्र च ॥ अर्थ:~ हे कुंती पुत्र! यदि तुम मुझसे पूछत...
🌺🪴स्वास्थ्य घरेलू नुस्खे🪴🌺                 अजवाइन बेहद गुणकारी पौधा.. लेकिन है क्या कोन सा पौधा हे ये… अजवाइन  की पत्तियों में संतुलित रूप से आयरन, सोडियम, पोटैशियम और कैल्शियम पाया जाता है, जो यूरीन से संबंधी समस्याओं को दूर करने में आपकी मदद कर सकता है। इसकी पत्तियों के इस्तेमाल से मस्तिष्क और पाचन नली में किसी भी तरह के सूजन और संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है।बारिश या फिर सर्दी का मौसम अजवाइन के पौधे को लगाने के लिए उपयुक्त समय है। दरअसल बारिश के मौसम में गर्माहट और ठंडक दोनों रहती है, जो पौधे के लिए नुकसानदायक नहीं है।जब पौधा ग्रो करने लगे तो इसे नियमित रूप से धूप दिखाएं. शुरुआत में इसे बस दो घंटे के लिए धूप में रखें. -जब अजवाइन का पौधा थोड़ा बड़ा हो जाए तो इसे चौड़े गमले में शिफ्ट कर दें. -बारिश या सर्दी का मौसम अजवाइन के पौधे को लगाने के लिए अच्छा समय हैअजवाइन के हरे पत्ते को ओरेगेनो (Oregano) के नाम से जाना जाता है। हां यह वही हर्ब है जिसको आप अपने पिज़्ज़ा के ऊपर शामिल कर बड़े चाव से इसका सेवन करती हैं। खास बात यह है कि अजवाइन...

जय श्री राम

 जय श्री राम   🙏